E-paperUncategorizedराज्यसंपादकीय

जब पुलिस की सक्रियता घटना के बाद दिखाई दे, तो सवाल घटना से ज्यादा व्यवस्था पर उठते हैं

बिहार में अपराध का शोर और कानून-व्यवस्था की खामोशी

बिहार की राजनीति में कानून-व्यवस्था कोई नया मुद्दा नहीं है। लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को एक साथ रखकर देखिए तो तस्वीर सिर्फ अपराध की नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं की भी दिखाई देती है।

कहीं 22 साल का युवक लापता है और परिवार दर-दर भटक रहा है। कहीं सड़क पर नाबालिगों के साथ बदसलूकी का वीडियो वायरल होने के बाद पूरा राज्य शर्मसार है। कहीं सरकारी स्कूल की छात्राएं अपने ही प्रधानाध्यापक पर गंभीर आरोप लगा रही हैं। कहीं पुलिस का एक जवान अपनी बहन की हत्या कर खुद की जान ले लेता है। और कहीं तीन मंजिला मकान के भीतर सैकड़ों किलो गांजा बरामद हो रहा है।

इन घटनाओं को अलग-अलग अपराध मानकर फाइलों में रख देना आसान है। मुश्किल यह पूछना है कि क्या इन सबके पीछे कानून-व्यवस्था की कोई साझा कमजोरी दिखाई दे रही है?

अमन लापता है, लेकिन सवाल सिर्फ अमन का नहीं

अथमलगोला के सूर्यपुरा गांव का 22 वर्षीय अमन कुमार 13 सितंबर से लापता है। परिवार ने अपहरण की आशंका जताते हुए शिकायत की। कई दिन तक कोई स्पष्ट सुराग नहीं मिलने के बाद ग्रामीणों का आक्रोश सड़क पर उतरा और मोकामा-बख्तियारपुर फोरलेन जाम किया गया।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों जाम हुई।

सवाल यह है कि एक परिवार को अपने लापता बेटे की तलाश के लिए सड़क पर उतरने की नौबत क्यों आई?

लोकतंत्र में सड़क जाम कानूनन उचित है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। पुलिस कार्रवाई भी अपनी जगह जरूरी है। लेकिन किसी लापता व्यक्ति की तलाश और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई—दोनों के बीच प्राथमिकता का संतुलन दिखाई देना चाहिए।

परिवार को पुलिस से सबसे पहले यही सुनना चाहिए—
“आपका बेटा कहां है, हम उसे खोज रहे हैं।”

न कि यह महसूस हो कि उसकी आवाज सड़क के शोर में दब गई है।

जमुई ने सिर्फ अपराध नहीं, समाज का आईना दिखाया

19 सितंबर की जमुई की घटना ने बिहार को झकझोर दिया। दो नाबालिगों के साथ कथित बदसलूकी का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया और उसके बाद व्यापक आक्रोश हुआ। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कई आरोपियों को पकड़ा और मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस मुठभेड़ में पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार हुआ। पुलिस के अनुसार गिरफ्तारी के दौरान उसने भागने की कोशिश की और गोलीबारी की स्थिति बनी।

यहां दो तस्वीरें साथ-साथ दिखाई देती हैं।

पहली तस्वीर में सड़क पर कानून से बेखौफ कुछ लोग हैं।

दूसरी तस्वीर में घटना के बाद तेजी से सक्रिय पुलिस है।

लेकिन असली कसौटी तीसरी तस्वीर है—वह तस्वीर जिसमें ऐसी घटना होने ही न पाए।

एनकाउंटर के बाद तालियां बजाना आसान है। अपराध होने से पहले अपराधियों को रोकना कठिन।

कानून-व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि अपराधी को गोली कहां लगी। सफलता इससे मापी जानी चाहिए कि अपराध की जमीन कितनी जल्दी पहचानी गई और अपराध होने से पहले पुलिस वहां क्यों नहीं थी।

नवादा का स्कूल: जहां घंटी पढ़ाई के लिए बजनी चाहिए

जमुई की घटना के बाद नवादा के एक सरकारी विद्यालय से छात्राओं द्वारा प्रधानाध्यापक पर अनुचित व्यवहार और छेड़छाड़ के गंभीर आरोप सामने आए। हंगामे के बाद पुलिस ने प्रधानाध्यापक को गिरफ्तार किया और POCSO तथा संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया।

स्कूल किसी समाज की सबसे सुरक्षित जगहों में होना चाहिए।

वहां अगर बच्चियां अपने शिक्षक से ही भय महसूस करें तो समस्या केवल एक व्यक्ति के आरोपों तक सीमित नहीं रहती। वह स्कूल की निगरानी व्यवस्था, शिकायत तंत्र और संस्थागत जवाबदेही तक पहुंचती है।

बच्चों की सुरक्षा के लिए दीवारें काफी नहीं होतीं, जवाबदेही की व्यवस्था भी चाहिए।

वर्दी का सवाल: हथियार किसके हाथ में है और जिम्मेदारी किसकी?

दानापुर में मोतिहारी में तैनात पुलिसकर्मी ओमचंद्र द्वारा अपनी बहन की गोली मारकर हत्या और फिर आत्महत्या की घटना ने पुलिस महकमे के भीतर हथियारों और पारिवारिक तनाव से जुड़े सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार घटना में सर्विस रिवॉल्वर का इस्तेमाल हुआ और पुलिस पारिवारिक विवाद की आशंका की जांच कर रही है।

इस घटना से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना जरूरी है।

लेकिन एक सवाल जांच का इंतजार नहीं करता—

जिस हाथ में कानून लागू करने की ताकत दी गई है, उस हाथ की निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी मजबूत है?

पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। उनके निजी जीवन में तनाव हो सकते हैं। मगर हथियार के साथ जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।

318 किलो गांजा: नशे का कारोबार भी कानून-व्यवस्था का चेहरा है

समस्तीपुर के बिथान में पुलिस और नारकोटिक्स टीम की कार्रवाई में 318.769 किलोग्राम गांजा बरामद होने और आरोपियों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट सामने आई है।

तीन सौ किलो से अधिक गांजा किसी एक व्यक्ति की जेब का नशा नहीं होता।

यह एक नेटवर्क की ओर इशारा करता है—सप्लाई, भंडारण, परिवहन और बाजार।

यही वह जगह है जहां कानून-व्यवस्था को सिर्फ थाने की FIR से आगे बढ़ना होगा।

माल पकड़ा जाना अच्छी कार्रवाई है; नेटवर्क तक पहुंचना असली चुनौती है।

अगर हर बार ट्रक, मकान या गोदाम पकड़ा जाए लेकिन सप्लाई की पूरी श्रृंखला बची रहे, तो पुलिस की सफलता खबर बनेगी और नशे का कारोबार फिर अगली खबर बन जाएगा।

पटना की सड़क पर युवा और पुलिस आमने-सामने

प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी मांगों को लेकर पटना में छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, लाठीचार्ज और हिरासत की घटनाएं सामने आई हैं। अगस्त में प्रदर्शन के दौरान वॉटर कैनन और लाठीचार्ज की रिपोर्ट भी हुई, जबकि छात्र नेता अमन ने पुलिसकर्मी द्वारा मारपीट का आरोप लगाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है।

यहां सवाल सिर्फ पुलिस बनाम छात्र का नहीं है।

सवाल है कि क्या प्रशासन और असहमति के बीच संवाद की जगह लगातार टकराव ले रहा है?

प्रदर्शनकारियों को कानून नहीं तोड़ना चाहिए। पुलिस को भी कानून के दायरे में रहकर भीड़ नियंत्रित करनी चाहिए।

लोकतंत्र में बैरिकेड जरूरी हो सकते हैं, लेकिन संवाद की बैरिकेडिंग लोकतंत्र के लिए महंगी पड़ती है।

और फिर आती है अपराधियों की सूची

जब पुलिस को फरार अपराधियों पर इनाम घोषित करना पड़े, तो यह कार्रवाई अपराधियों के खिलाफ जरूरी कदम हो सकती है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी पैदा करती है कि वे अपराधी इतने लंबे समय तक फरार कैसे रहे।

एक अपराधी पर इनाम घोषित करना पुलिस की सक्रियता है।

लेकिन दर्जनों मामलों में वांछित अपराधी का वर्षों तक कानून की पहुंच से बाहर रहना व्यवस्था के लिए चुनौती भी है।

अपराधी को पकड़ने के लिए पोस्टर, इनाम और विशेष टीम जरूरी हैं। मगर उससे भी जरूरी है वह खुफिया और स्थानीय पुलिस तंत्र जो अपराधी को इनाम की सूची तक पहुंचने से पहले ही पकड़ सके।

बाढ़ में डूबे घर और अपराध का दूसरा चेहरा

प्राकृतिक आपदा के समय कानून-व्यवस्था की परीक्षा और कठिन हो जाती है।

जब गांव खाली होते हैं, परिवार राहत शिविरों में होते हैं और संपत्ति पीछे छूट जाती है, तब पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ सड़क पर गश्त करने की नहीं होती—लोगों के पीछे छूटे घरों की सुरक्षा भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा होती है।

आपदा से विस्थापित व्यक्ति यदि यह सोचकर रात गुजारे कि पानी से तो बच गए, लेकिन घर में चोरी या हमला न हो जाए—तो आपदा केवल प्राकृतिक नहीं रह जाती।

वह प्रशासनिक चुनौती बन जाती है।

अपराध की सबसे भयावह तस्वीर: सामान्य होती हिंसा

मुजफ्फरपुर, वैशाली और आसपास के इलाकों में हत्या, आपसी रंजिश, जमीन, ठेकेदारी और वर्चस्व से जुड़े विवादों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।

हर हत्या के बाद एक प्रेस नोट आता है।

हर प्रेस नोट में कार्रवाई का भरोसा होता है।

हर कार्रवाई के बाद कुछ गिरफ्तारियां होती हैं।

लेकिन जनता के मन में एक ही सवाल बचता है—

अगली गोली चलने से पहले क्या कोई उसे रोक पाएगा?

यही कानून-व्यवस्था की असली परीक्षा है।

सरकार के लिए पांच असहज सवाल

पहला—क्या पुलिस की प्राथमिकता अपराध होने के बाद की कार्रवाई से आगे बढ़कर अपराध रोकने तक पहुंच रही है?

दूसरा—क्या महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील इलाकों और संस्थानों में पर्याप्त निगरानी तंत्र है?

तीसरा—क्या पुलिस बल के भीतर हथियारों, तनाव और व्यवहार संबंधी निगरानी की व्यवस्था पर्याप्त है?

चौथा—क्या ड्रग्स और संगठित अपराध के मामलों में केवल छोटे आरोपियों तक कार्रवाई सीमित रह जाती है या पूरे नेटवर्क तक पहुंचा जाता है?

पांचवां—क्या जनता को पुलिस पर भरोसा इसलिए है कि पुलिस समय पर पहुंचती है, या इसलिए कि अपराध होने के बाद कार्रवाई करती है?

इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।

बिहार को ‘मॉडल’ नहीं, परिणाम चाहिए

किसी राज्य में कानून-व्यवस्था पर बहस करते समय राजनीतिक नारे बहुत आसान होते हैं।

कोई इसे किसी दूसरे राज्य के मॉडल से जोड़ देगा।

कोई अपराध के आंकड़ों का हवाला देगा।

कोई सरकार की उपलब्धियां गिनाएगा।

कोई विपक्ष के आरोपों को दोहराएगा।

लेकिन जिस मां का बेटा लापता है, उसे मॉडल का नाम नहीं चाहिए।

जिस बच्ची को सड़क पर अपमानित किया गया, उसे राजनीतिक बयान नहीं चाहिए।

जिस छात्र को अपनी परीक्षा और भविष्य की चिंता है, उसे लाठी नहीं—जवाब चाहिए।

और जिस नागरिक ने पुलिस को अपनी सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी दी है, वह सिर्फ एनकाउंटर की खबर नहीं चाहता।

वह चाहता है कि अपराधी को अपराध करने का मौका ही न मिले।

यही किसी भी कानून-व्यवस्था की अंतिम कसौटी है।

बिहार में पुलिस कार्रवाई हो रही है, गिरफ्तारियां हो रही हैं, मुठभेड़ हो रही हैं, गांजा पकड़ा जा रहा है, फरार अपराधियों पर इनाम घोषित हो रहा है। लेकिन इन सारी कार्रवाइयों के बीच एक बड़ा सवाल लगातार खड़ा है—

क्या राज्य अपराध का पीछा कर रहा है, या अपराध से पहले ही उसकी राह रोक पा रहा है?

क्योंकि कानून-व्यवस्था की असली जीत तब नहीं होती जब पुलिस अपराधी तक पहुंच जाती है।

असली जीत तब होती है जब अपराधी अपराध करने से पहले ही जान जाए कि कानून उससे पहले पहुंच जाएगा।

और फिलहाल बिहार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है।

-प्रशांत कुमार प्रणय

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button