
पटना। बिहार की राजनीति में भोजपुरी गीतकार और लौरिया से भाजपा विधायक विनय बिहारी का एक बयान चर्चा में है। एक बातचीत के दौरान उन्होंने चुनाव में पैसे के इस्तेमाल और उसके बाद विकास कार्यों पर पड़ने वाले कथित आर्थिक बोझ को लेकर सवाल उठाए। साथ ही भाजपा को लेकर उन्होंने कहा कि “भारतीय जनता पार्टी हमारे लिए मंदिर है, लेकिन मंदिर में भी अगर कुछ गड़बड़ियां हो तो ज़मीर कहता है कि बोलना चाहिए।”
उनका बयान ऐसे समय में आया है जब वे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में लौरिया से भाजपा के टिकट पर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर चुके हैं। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक 2010 में निर्दलीय जीत से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले विनय बिहारी 2015 और 2020 में भाजपा के टिकट पर जीते और 2025 में भी भाजपा उम्मीदवार के तौर पर निर्वाचित हुए।
‘कितना कर्ज़ा खैबा राजा?’—बयान में क्या कहा
विनय बिहारी ने चुनाव में पैसे के इस्तेमाल को विकास से जोड़ते हुए कहा कि जब किसी क्षेत्र में विकास होता है तो उसका असर दिखाई देता है, लेकिन चुनाव के दौरान बांटे गए पैसे के कारण पैदा होने वाले आर्थिक बोझ से विकास प्रभावित होता है।
उनकी बातचीत का एक प्रमुख हिस्सा भोजपुरी अंदाज में था—“कितना कर्ज़ा खैबा राजा? … कर्ज़ा खा के कैसे हमनी के विकास करबइब राजा?”
इसके बाद उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव और बोलने की सीमा को लेकर भी एक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कम बोलने पर वोट कट सकता है, ज्यादा बोलने पर टिकट कट सकता है और बहुत ज्यादा बोलने पर गर्दन कटने की नौबत आ सकती है।
इसी क्रम में उनका यह वाक्य भी चर्चा में आया कि “कटना है और मेरे नसीब में वही लिखा होगा तो अलग बात है।”
इन टिप्पणियों को लेकर अब राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की व्याख्याएं हो रही हैं। हालांकि, उपलब्ध बयान में उन्होंने किसी दूसरी पार्टी में जाने की घोषणा नहीं की है और न ही भाजपा छोड़ने की बात कही है। इसलिए उनके शब्दों को किसी संभावित राजनीतिक पाला-बदल की घोषणा के रूप में प्रस्तुत करना फिलहाल तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
‘अब चुभने लगा?’—उठ रहे हैं पुराने सवाल
विनय बिहारी के ताजा बयान को लेकर एक दूसरा सवाल भी सामने आ रहा है—अगर चुनाव में पैसे के इस्तेमाल को लेकर उन्हें आपत्ति है, तो यह सवाल अभी क्यों उठ रहा है?
यही वह बिंदु है जहां उनके पुराने राजनीतिक सफर को देखना जरूरी हो जाता है।
विनय बिहारी 2010 में लौरिया से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते थे। निर्वाचन संबंधी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उन्हें 38,381 वोट मिले थे और उन्होंने जदयू के प्रदीप सिंह को 10,881 मतों से हराया था।
इसके बाद 2015 में वे भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे और लौरिया से जीत हासिल की। उन्हें 57,351 वोट मिले, जबकि राजद के रण कौशल प्रताप सिंह को 39,778 वोट मिले।
2020 में भी भाजपा ने उन पर भरोसा जताया और उन्होंने 77,927 वोट हासिल कर जीत दर्ज की।
2025 में भी वे भाजपा के उम्मीदवार रहे और उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक 96,510 वोट के साथ लौरिया सीट जीती।
यानी उनका राजनीतिक सफर निर्दलीय विधायक से भाजपा के लगातार तीन बार निर्वाचित विधायक तक पहुंचा है।
कौन हैं विनय बिहारी?
विनय बिहारी सिर्फ राजनेता नहीं हैं। बिहार की राजनीति में आने से पहले उनकी पहचान भोजपुरी गीतकार, लेखक, फिल्म निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और गायक के रूप में बनी।
2025 के चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपना पेशा Film Writer, Producer, Director, Actor और Singer बताया है। हलफनामे के अनुसार उन्होंने पटना कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय से 1992 में स्नातक किया।
भोजपुरी संगीत और सिनेमा में उनका नाम लंबे समय से सक्रिय लोगों में रहा है। उनकी पहचान मुख्य तौर पर गीत लेखन से बनी और बाद में उन्होंने फिल्म निर्माण तथा अभिनय सहित दूसरे क्षेत्रों में भी काम किया।
एक पुराने Telegraph India रिपोर्ट में भी उन्हें लोक कलाकार के रूप में उल्लेखित किया गया था। उस दौरान उन्होंने बिहार की लोक कलाओं के संरक्षण और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने की जरूरत की बात कही थी।
उनका संगीत से रिश्ता आज भी दिखाई देता है। मसलन, Spotify पर उनके नाम से संगीत कलाकार प्रोफाइल उपलब्ध है और वहां उनके पुराने गीत भी सूचीबद्ध हैं।
भोजपुरी करियर: गीतकार से फिल्म और राजनीति तक
विनय बिहारी का भोजपुरी करियर उनकी राजनीतिक पहचान से काफी पहले शुरू हुआ था। उपलब्ध स्रोत उन्हें भोजपुरी गीतकार के साथ-साथ फिल्म लेखक, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के रूप में दर्ज करते हैं। 2015 और 2020 के चुनावी हलफनामों में भी यही पेशागत विवरण मिलता है।
भोजपुरी फिल्म और संगीत जगत में उनकी पहचान की एक खास वजह यह रही कि उन्होंने लोकभाषा और आम बोलचाल की भोजपुरी में गीत लिखे। बाद में यही लोकप्रियता उन्हें राजनीतिक मंच तक ले गई।
2014 में मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनने के समय Times of India ने भी उन्हें गायक और भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुके व्यक्ति के तौर पर उल्लेखित किया था।
राजनीति में आने के बाद भी उन्होंने अपनी संगीत पहचान नहीं छोड़ी। 2022 में एक सरकारी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाते और गीत गाते हुए उनका वीडियो भी सामने आया था।
विनय बिहारी का राजनीतिक सफर
2010: पहली बार निर्दलीय विधायक
विनय बिहारी ने 2010 में लौरिया विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। उन्होंने 38,381 वोट हासिल किए और जदयू उम्मीदवार प्रदीप सिंह को 10,881 मतों से पराजित किया।
यह उनकी राजनीति में बड़ी एंट्री थी।
2014: जीतन राम मांझी सरकार में मंत्री
2014 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने। इस सरकार में विनय बिहारी को कला, संस्कृति एवं युवा मामले विभाग की जिम्मेदारी मिली। उस समय वे निर्दलीय विधायक थे और जदयू सरकार को समर्थन दे रहे थे। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक मांझी मंत्रिमंडल में शामिल दो निर्दलीय विधायकों में विनय बिहारी भी थे।
बाद में उनके पास पर्यटन और सहकारिता विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था।
मंत्री रहते हुए उन्होंने बिहार की कला-संस्कृति, पर्यटन और खेल से जुड़े कई मुद्दों पर विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखी।
2015: भाजपा के टिकट पर वापसी
2015 के विधानसभा चुनाव में विनय बिहारी भाजपा के उम्मीदवार बने। लौरिया से उन्होंने 57,351 वोट हासिल किए और राजद के रण कौशल प्रताप सिंह को 17,573 वोटों से हराया।
यहीं से उनका भाजपा के साथ चुनावी सफर शुरू हुआ।
2020: भाजपा से दूसरी जीत
2020 में भाजपा ने फिर उन्हें लौरिया से उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में विनय बिहारी को 77,927 वोट मिले और वे विजयी रहे।
2025: लगातार तीसरी भाजपा जीत
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने विनय बिहारी को लौरिया से मैदान में उतारा। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 96,510 वोट हासिल किए और जीत दर्ज की।
इस तरह लौरिया से उनका चुनावी रिकॉर्ड इस प्रकार रहा:
| वर्ष | पार्टी | स्थिति |
|---|---|---|
| 2010 | निर्दलीय | विजयी |
| 2015 | भाजपा | विजयी |
| 2020 | भाजपा | विजयी |
| 2025 | भाजपा | विजयी |
सड़क के लिए अनोखा आंदोलन भी कर चुके हैं
विनय बिहारी का राजनीतिक सफर सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहा। 2017 में लौरिया क्षेत्र की सड़क निर्माण की मांग को लेकर उन्होंने विधानसभा परिसर में अपने कपड़े उतारकर विरोध प्रदर्शन किया था। इस आंदोलन के बाद सड़क निर्माण के लिए सरकार की ओर से आश्वासन मिलने की खबरें आई थीं।
यह घटना उनके राजनीतिक जीवन के उन विवादित लेकिन चर्चित प्रसंगों में गिनी जाती है, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में ला दिया था।
2026 में फिर क्यों चर्चा में हैं विनय बिहारी?
अब उनके ताजा बयान ने एक अलग तरह की राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है।
एक तरफ वे भाजपा को “हमारे लिए मंदिर” बता रहे हैं, दूसरी तरफ उसी संगठन के भीतर संभावित गड़बड़ियों पर बोलने को अपने “ज़मीर” की आवाज बता रहे हैं।
दूसरी तरफ चुनाव में पैसे के इस्तेमाल और उसके कथित आर्थिक प्रभाव पर उनका सवाल है।
और तीसरी तरफ उनका यह कथन—
“कम बोलिए, वोट कटता है। ज्यादा बोलिए, टिकट कटता है। और बहुत ज्यादा बोलिए तो गर्दन कटती है।”
—राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्होंने अपने बयान में किसी वैकल्पिक पार्टी का नाम नहीं लिया है और न ही भाजपा छोड़ने की घोषणा की है। इसलिए फिलहाल इसे भाजपा से उनके अलग होने का ऐलान कहना जल्दबाजी होगी।
सियासत में संकेतों की अपनी भाषा होती है, लेकिन अंतिम अर्थ वही माना जाता है जो नेता स्पष्ट रूप से घोषित करे।
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—विनय बिहारी का यह बयान पार्टी के भीतर असहमति दर्ज कराने तक सीमित है, या आने वाले दिनों में वे इससे आगे कोई राजनीतिक कदम उठाते हैं?
इतना जरूर है कि भोजपुरी के मंच से राजनीति में आए विनय बिहारी का सफर साधारण नहीं रहा—2010 में निर्दलीय विधायक, 2014 में मंत्री, 2015 से भाजपा विधायक और 2025 में लगातार चौथी विधानसभा जीत तक उनका राजनीतिक सफर कई मोड़ों से गुजर चुका है।
प्रशांत कुमार प्रणय

